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चदरिया झीनी सी

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चार दिवारी पे टिका कमरा, जो किसी का घर कहलाता है, जाड़ा गर्मी बरसात से थोड़ा सुकून दिलाता, वो कच्चा सा लगता जैसे मुर्गी का दरबा, दरवाजे के नाम पर, मुख्य द्वार पर पड़ी झीनी सी चादर, किसी के लिए महल से कम नहीं था, क्यों, क्योंकि छत थी उसके सिर पर, किसी को तो ये टूटी सी छत भी नसीब नहीं, सोते है सड़क किनारे, तन ढकने को वो झीनी चादर भी करीब नही, इसलिए वो खुश थे शायद उस कच्चे कमरे में भी, क्योंकि कहने को छत तो थीतन ढकने को, कपड़े न सही, इज्जत छुपाने को वो झीनी चादर तो थी, दो जून की रोटी, कैसे तैसे करके जुटाती वो नन्ही सी लड़की, दूसरों को खुश करती अपने अभिनय से, कभी हँसती कभी रोती तो कभी किसी पे जा के वो भड़की, दिखाती खेल गुड्डे गुड़ियों का, कभी रूठना मनाना वो बंदर बंदरिया का, कभी खेल ताश के पत्तों का, जिसमें छिपी होती किस्मत की बाज़ी, हारती कभी जीतती, कभी मन मसोस रह जाती है फिर देखती कभी भीख मांगने वाले को, तो ठगी सी खड़ी रह जाती है, क्योंकि मिलते उन्हें कम से कम  रहम ओ करम पर ही सही, कभी दो तो पांच के सिक्के, बस इसकी बेचारी की किस्मत तो, चवन्नी अठ्ठनी पर ही घूम...

मानवता

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मानवता कोरोना से पीड़ित इस माहौल में जहां सब अपने–अपने में परेशान थे, वही एक 7 साल की नन्हीं गुड़िया दूसरों के लिए व्याकुल थी।। गुड़िया इन सब से बेखबर बस अपने घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठे उस बेघर परिवार की चिंता में डूबी थी। उसे नहीं थी कोई फिक्र की वो भी बीमार हो सकती है, उसे भी वायरस पकड़ सकता है।। उसे बस फिक्र थी तो उन परिवार में पल रहे दो मासूमों की, जो घर की देहरी पर बैठ भूख से तड़प रहे थे।। गुड़िया की माँ चिल्लाते हुए बोली,"अंदर आती है या नहीं, वरना तेरे बाप से कह कर टाला डलवा दूँ द्वार पर।। जब देखो उन नंगे गन्दे बच्चों के पास जाती है ।कल को तू बीमार हो गई तो क्या करेंगे हम।।" गुड़िया जो उम्र की कच्ची थी पर जीवन के अनुभव से गठी, माँ से इतराते हुए बोली ,                                  "मैं बीमार होउंगी अगर तो तुम और बाबा हो न मेरे लिए,   पर कल को इन बेघरों को कुछ हो गया तो ये बेचारे बेमौत मारे जाएंगे, इनके पास तो न रहने का घर है, न खाने को दो जून की रोटी, न बीमारी की दवा दारू के प...

प्रकृति के सानिध्य में

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नमस्कार दोस्तों 🙏,                  मैं आयुषी अग्रवाल आज आप लोगों के लिए कुछ ऐसी बातें लायी हूं जो हमें प्रकृति से जोड़ेगी और हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।। आशा करती हूं कि हमारे आज के विचार आपकी पसंद आये।🙏 "प्रकृति" , आज की नई पीढ़ी शायद कही न कही इस शब्द की ताकत से वंचित है,  आजकल  की भागदौड़  भरी जिंदगी मेंं लोग प्रकृति के  साथ सामंजस्य ही  नहीं बैठा पाते, और फिर थक जाने के बाद वो इसी सुकून की तलाश में कभी  कभी लांग वेकेशन पर जाते है।। जब वो चीज़ हमारे आसपास ही उपलब्ध है तो उसे ढूंढने हम बाहर क्यों जाए, या उसके लिए पैसे क्यों खर्च करे।।   खैर ये सब छोड़िये, असली मुद्दे पर आते है।। आप लोग सोच रहे होंगे कि प्रकृति का सानिध्य ही क्यों, हवा लेने के लिए हम A. C. कूलर में बैठ जाते है।।  ठंड से बचने के लिए रूम हीटर भी है।। फिर बाहर क्यों जाए।। लेकिन शायद आप ये भूल रहे है कि इन कूलर और रूम हीटर से हमारे सेहत पर कितना नुकसान पहुँचता है।। मैंने कई लोगों को देखा है जिनका रंग A. C. में रह...

मर्द को दर्द नहीं

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नमस्कार🙏 दोस्तों मैं आयुषी अग्रवाल एक बार फिर से आप सभी के सामने अपने कुछ विचारों को जो की मेरे निजी जीवन से भी कुछ तथ्यों में सम्बंधित है व्यक्त करना चाहती हूं, आशा करती हूं कि पसंद आये आप सबको।। मेरा मेरे इस लेख से किसी की भी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई उद्देश्य नहीं है।। तो कृपया आप में से कोई भी इसे खुद से न जोड़े। ।🙏🙏 तो आइए पढ़ते है,...... "होता नही दर्द उस इंसान को इसीलिए मर्द वो कहलाता है जब हो कोई भी दुष्कर्म लड़कियों के साथ, तो वो पूरा मर्द जात बेदर्द कहलाता है," क्या खूब है न, कि लड़को को बचपन से जरा से भी आंसू बहने पर "मर्द को दर्द नही होता" ये पाठ पढाया जाता है।। क्यों आखिर, क्या मर्द के सीने में दिल नहीं, नही भाई सही है क्योंकि मर्द तो शायद पत्थर दिल होता है, है ना?? इसीलिए, अब समझी कि क्यों सब कहते कि मर्द को दर्द नही होता, पर मैंने तो देखा है….... "अपने बाबा की आंखों में आंसू, जब पहली बार मैं दीवाली के त्योहार में अपने घर पर नही थी, हाँ वो मुझे लेने आये दीवाली की पहली रात, मेरे होस्टल, तब मैंने उन्हें रोता हुआ देखा है,...

ओ वुमनिया

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नमस्कार दोस्तों मैं आयुषी अग्रवाल एक बार फिर आपके सामने कुछ बातें लायी हूँ, माफी चाहूंगी कि दो दिन मैं कुछ नहीं लिख पाई।। लेकिन उम्मीद है कि मेरा ये लेख आप सबको पसन्द आएगा।। जैसा कि हम सब जानते है कि प्राचीन काल में औरतों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था।। न ही उन्हें बोलने का कोई हक था।। आज के युग में भी बदलाव है पर कहीं कहीं आज भी औरतों को कम दर्जे का ही माना जाता है।। मैं समझ नहीं पाती,                       "आखिर क्यों???" क्या औरत इंसान नहीं, क्या औरत के सीने में दिल नहीं, या फिर उस दिल में कोई भावनाएं कोई इच्छाएँ नहीं।।। औरत को पढ़ने का हक नहीं दिया जाता था, औरत को परिवार के मामले में भी बोलने का हक नहीं दिया जाता, आज भी, अगर कोई लड़की अपने घर में किसी पारिवारिक मुद्दे पर अपने सुझाव दे तो आज भी उससे कहा जाता है कि,   "तुझे बीच में बोलने का कोई हक नहीं, लड़की है तो लड़की रह, लड़का बनने की कोशिश न कर।।"                      "आखिर क्यों???" क्या वो लड़की का परिवार नहीं।।...

पाँव का बिछुवा

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आज रूही खुश थी, क्योंकि आज रिशु उसे कुछ सरप्राइज देने वाला था, सुबह से चहकती फिर रही थी पूरे घर में, कही इधर तो कही उधर, जैसे कोई चिड़िया दाने को देख फुदकती है।।। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि आज उसके जीवन का एक नया पन्ना उसके दिल की किताब में लिखने वाला है कोई।। रिशु और रूही दोनों स्कूल के समय से अच्छे दोस्त थे, इसके अलावा उनके बीच कुछ नहीं था, है रूही जरूर मन ही मन रिशु को पसंद करती थी, पर रिशु हमेशा कुछ ऐसी हरकत करता जिससे रूही के दिल को ठेस पहुँचती।। आज भी ये बात रिशु के किसी दोस्त ने रूही को बताई, कि रिशु तुम्हारे लिए कुछ सरप्राइज प्लान कर रहा।। वो घड़ी भी आ गई, रूही रिशु के ख्वाबों में खोई हुई थी, तभी फ़ोन की घण्टी बजी।। रूही ने फ़ोन उठाया, उधर से रिशु बोल रहा था, "कहा है पगलिया, जल्दी से बाहर वाले पार्क में मिल, मुझे कुछ मैथ के सॉल्यूशन पूछने है।।"  रूही उदास मन होकर वहाँ पहुँच गई, चारों तरफ देखा रिशु कही नजर नहीं आया, वो उदास वही पेड़ की ओट में मुँह लटका कर खड़ी हो गई, वहाँ पर मौजूद और भी प्यार के जोड़ो को देखकर, उसे लगा कि वो भी यूँही साथ बैठती, बातें करती, बाहों में...

कलमुँही

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बहूरानी खुश थी अपने नए परिवार में, सब लोग भी अच्छे से पेश आते थे अभी तक उसके साथ, उसे कोई दुख न था।। रसोई में काम करते करते अचानक उसे चक्कर आने लगे, महराजिन रसोई से ही चिल्लाते हुए बोली मालकिन मालकिन  "बहूरानी के पैर भारी होवे है, घर में लल्ला आन वालो है"।। डॉक्टर को बुलाया और बहूरानी की जांच करवाई गई तो बात सच थी कि बहूरानी पेट से है।। सबकी खुशी का ठिकाना न था।। " सासू माँ तो बहूरानी के आगे पीछे डोलती, कही मेवे लिए, तो कहीं दूध का कटोरा लिए, कहीं घी परोसती खाने में तो कहीं भर भर मुट्ठी केसर"।। खुश जो थी, बहूरानी से कहती फिरती की लल्ला ही जनना।। अब बहूरानी को भी समझ आ गई कि उसकी इतनी सेवा क्यों परोसी जा रही क्योंकि सबको लल्ला की चाह थी,  दिन बीतते चले गए, बहूरानी का पेट नजर आने लगा, " सास शाम सवेरे नजर का बंटा लिए घूमती सांझ ढ़ले मिर्ची धुंए में झोंकती, कि कही बहूरानी को नजर न लगे। कहीं मेरे लल्ला को न कोई ताड़ ले"।। पर बहूरानी के फूटे भाग ये सुख कुछ ही दिन के उसके दामन में लिखे थे,  जच्ची की रात आ गई, बहूरानी को अस्पताल ले जाया गया।। कुछ घन्टों ...