चदरिया झीनी सी
चार दिवारी पे टिका कमरा, जो किसी का घर कहलाता है, जाड़ा गर्मी बरसात से थोड़ा सुकून दिलाता, वो कच्चा सा लगता जैसे मुर्गी का दरबा, दरवाजे के नाम पर, मुख्य द्वार पर पड़ी झीनी सी चादर, किसी के लिए महल से कम नहीं था, क्यों, क्योंकि छत थी उसके सिर पर, किसी को तो ये टूटी सी छत भी नसीब नहीं, सोते है सड़क किनारे, तन ढकने को वो झीनी चादर भी करीब नही, इसलिए वो खुश थे शायद उस कच्चे कमरे में भी, क्योंकि कहने को छत तो थीतन ढकने को, कपड़े न सही, इज्जत छुपाने को वो झीनी चादर तो थी, दो जून की रोटी, कैसे तैसे करके जुटाती वो नन्ही सी लड़की, दूसरों को खुश करती अपने अभिनय से, कभी हँसती कभी रोती तो कभी किसी पे जा के वो भड़की, दिखाती खेल गुड्डे गुड़ियों का, कभी रूठना मनाना वो बंदर बंदरिया का, कभी खेल ताश के पत्तों का, जिसमें छिपी होती किस्मत की बाज़ी, हारती कभी जीतती, कभी मन मसोस रह जाती है फिर देखती कभी भीख मांगने वाले को, तो ठगी सी खड़ी रह जाती है, क्योंकि मिलते उन्हें कम से कम रहम ओ करम पर ही सही, कभी दो तो पांच के सिक्के, बस इसकी बेचारी की किस्मत तो, चवन्नी अठ्ठनी पर ही घूम...