ओ वुमनिया
नमस्कार दोस्तों मैं आयुषी अग्रवाल एक बार फिर आपके सामने कुछ बातें लायी हूँ, माफी चाहूंगी कि दो दिन मैं कुछ नहीं लिख पाई।। लेकिन उम्मीद है कि मेरा ये लेख आप सबको पसन्द आएगा।।
जैसा कि हम सब जानते है कि प्राचीन काल में औरतों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था।। न ही उन्हें बोलने का कोई हक था।। आज के युग में भी बदलाव है पर कहीं कहीं आज भी औरतों को कम दर्जे का ही माना जाता है।। मैं समझ नहीं पाती,
"आखिर क्यों???"
क्या औरत इंसान नहीं, क्या औरत के सीने में दिल नहीं, या फिर उस दिल में कोई भावनाएं कोई इच्छाएँ नहीं।।।
औरत को पढ़ने का हक नहीं दिया जाता था, औरत को परिवार के मामले में भी बोलने का हक नहीं दिया जाता,
आज भी, अगर कोई लड़की अपने घर में किसी पारिवारिक मुद्दे पर अपने सुझाव दे तो आज भी उससे कहा जाता है कि,
"तुझे बीच में बोलने का कोई हक नहीं, लड़की है तो लड़की रह, लड़का बनने की कोशिश न कर।।"
"आखिर क्यों???"
क्या वो लड़की का परिवार नहीं।। अरे हाँ माफ करना मैं तो भूल ही गई थी,
"कि लड़की पराये घर की होती है।। लड़की कैसे बीच में बोल सकती है, हद हो गई,"
अब लड़की ससुराल में किसी मामले पर बोले तो भी अजीब, ससुराल वाले भी यही बोलते कि तू चुप कर,
"पराये घर की आयी छोकरी हमको सिखाने चली है,जानती ही क्या है तू अभी हमारे परिवार के बारे में, तू मुँह बन्द रखा कर अपना"
भाई ये कहा की रीत है पराई पराई पराई, लड़कियाँ आखिर अपनी किसकी है,
पहले जमाने की तो भाई बात ही निराली है, अरे छोड़ो जी ज्यादा दूर ही क्यों जाना, आज के वक़्त की ही बातें ले लो,
मैंने देखी है अपने कॉलेज की छोरियां
"पहले घर में चूल्हे पे रोटी पकावे, घर वाले ने सबने खिलावे, फिर बेचारी लम्बी दूरी पैदल पार कर नदी पार कर कॉलेज को आवे, फिर लौट घर जावे, तो फिर से चूल्हा चौका सम्भाले जो इतवार का रोज पड़े तो माई बापू के साथ हारे(खेत) भी जावे।।
और जहां 10वीं पास हुई नहीं कि बाप बराबर छोरे के साथ ब्याह दी जावे।।
ब्याह के बाद फिर वही चूल्हा, वही खेत और एक सिर मड़ी मुसीबत, जल्दी बच्चे भी पैदा कर पाले।।
समझ नहीं आता मेरी तो कि औरत, "औरत है या कोई चलती फिरती मशीन"
मेहनत भी औरत करे घर का चूल्हा भी औरत करें।। खेता जोतन भी औरत ही मर्दा के संग जावे,
पर जब बात खुद के काम की आवे खुद के पैरा पर खड़े होन की तो ये कह कर चुप करा दी जावे कि
"अपनी औकात देखी है???"
मतलब क्या है अपनी औकात से मैं न समझ पाई।।
इसी बात पर एक छोटी सी कहानी कहना चाहूंगी उसके बाद विराम।।।
"औरत जो कभी बंदिशों में कैद थी,
उड़ने की उसकी भी कुछ ख्वाहिशें थे,
पहले मायका फिर ससुराल,
सब उसको जेल के कैदी से नजर आते थे,
माँ कहती थी कि अभी न कर कुछ,
जो ससुराल वाले चाहे तो पढ़ लियो,
ससुराल में जद वा बोली,
तो सुनी की बोझ बन आयी
माँ ने कुछ तो सिखाया ना,
यहाँ पैसा पति का फूकन चाही।।
जनी जो फिर उस छोरी ने छोरी,
उसकी हर ख्वाहिश को पूरी करनी चाही,
खुद की बन्दिशों को नजर रख,
उसकी बेड़िया खोलने वो आई,
न रही उसका भी मन मसोस,
जो घुट कर खुद कभी मर जाई,
अपनी बेटी का सपना पूरा करने,
वो अपने परिवार से आज लड़ आई,
छोड़ दिया घर बार, छोड़ दिया पति का प्यार,
ऐसा भी क्या वो नाम का सिंदूर,
जो उसकी असली मांग ही कभी न भर पाए,
अपनी ख्वाहिशों के तले जिस पति ने,
अपनी पत्नी के ख्वाब दबाए,
खुश है वो आज आज़ाद,
खुद भी बनी कुछ, बेटी को भी हर गुण सिखाए,
अकेली हो कर भी उसने,
बेटी के लिए माँ और बाप दोनों के फ़र्ज़ निभाए।।
आज खुश है वो जो सपने कभी देखे थे उसने,
आसमान में उड़ने के,
उड़ कर उन परिंदो को छूने के,
आज अपनी बेटी को उसने वो पर लगाए,
न खुद उड़ सकी पर,
अपनी बेटी को आसमां के सात रंग दिखाए,
जो धरती पर उसने की खुदाई कभी,
आज उसमें उसकी मेहनत के बीज उग आए,
इतने बरसों के बाद हाँ
उस माँ की मेहनत के फल नजर आए।।
तो मेरे प्यारे दोस्तों उम्मीद है कि पसन्द आयी होगी आप सभी को, इस लेख के माध्यम से मैं आप सभी को ये संदेश देना चाहती हूं कि
"लाख आये बंदिशे राहों में तेरी पर कभी तू न घबराना, होकर भी अकेले तू कभी खुद को अकेले न पाना, पहला तो तू खुद है तेरे साथ दूसरा है साथ वो तेरा खुदा, गर तूने कदम बढ़ाया एक भी खुद के लिए तो पूरी राह मंजिल तक दिखाने का तुझे वादा करता है वो तेरा खुदा।"
शुक्रिया।।
Nice ✌✌
ReplyDeleteThank you🙏
DeleteNice
ReplyDeleteShameful but true 🙌🙌
ReplyDeleteThanks ❤️🙏
Deletewaah👌
ReplyDeleteShukriya 🙏
DeleteSo nice
ReplyDeleteThank you🙏
DeleteDidu....bhut pyaara likha 👌👌👌
ReplyDeleteThank you so much sweetheart ❤️❤️🙏
DeleteExcellent work buaa💓
ReplyDeleteAww thank you much aadi❤️❤️❤️
DeleteWah, it's too good.. 😇🤗🤗
ReplyDeleteThank you dear❤️🙏
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