चदरिया झीनी सी

चार दिवारी पे टिका कमरा,
जो किसी का घर कहलाता है,
जाड़ा गर्मी बरसात से थोड़ा सुकून दिलाता,
वो कच्चा सा लगता जैसे मुर्गी का दरबा,
दरवाजे के नाम पर,
मुख्य द्वार पर पड़ी झीनी सी चादर,
किसी के लिए महल से कम नहीं था,
क्यों, क्योंकि छत थी उसके सिर पर,
किसी को तो ये टूटी सी छत भी नसीब नहीं,
सोते है सड़क किनारे,
तन ढकने को वो झीनी चादर भी करीब नही,

इसलिए वो खुश थे शायद उस कच्चे कमरे में भी,
क्योंकि कहने को छत तो थीतन ढकने को,
कपड़े न सही, इज्जत छुपाने को वो झीनी चादर तो थी,

दो जून की रोटी, कैसे तैसे करके जुटाती वो नन्ही सी लड़की,
दूसरों को खुश करती अपने अभिनय से,
कभी हँसती कभी रोती तो कभी किसी पे जा के वो भड़की,


दिखाती खेल गुड्डे गुड़ियों का,
कभी रूठना मनाना वो बंदर बंदरिया का,
कभी खेल ताश के पत्तों का,
जिसमें छिपी होती किस्मत की बाज़ी,
हारती कभी जीतती,
कभी मन मसोस रह जाती है
फिर देखती कभी भीख मांगने वाले को,
तो ठगी सी खड़ी रह जाती है,
क्योंकि मिलते उन्हें कम से कम 
रहम ओ करम पर ही सही,
कभी दो तो पांच के सिक्के,
बस इसकी बेचारी की किस्मत तो,
चवन्नी अठ्ठनी पर ही घूमती,

हाँ याद आयी वो बचपन की पढ़ाई,
उस लड़के की मासूम कहानी, 
जो इसी लड़की की तरह जीता था,
घर गया जब पैसे ले तो माँ को मरा पाया था,
किस्मत के पत्तों के खेल में जब उसने खुद को ठगा पाया था।।

लड़की में हिम्मत थी, घर में उसके न कोई बूढ़ी माँ थी,
हाँ वो सिर्फ अकेले थी,
क्योंकि लड़की जो थी, 
पैदा होते ही सड़क पर छोड़ दिया था घरवालों ने,
जैसे तैसे बड़ी हुई, जब अक्ल आयी तो बस
खुद ही खुद का सहारा बनी।।
तन ढकने को अपने झीनी सही पर
मजबूत उसने वो चद्दर चुनी।।



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