प्रकृति के सानिध्य में

नमस्कार दोस्तों 🙏,
                 मैं आयुषी अग्रवाल आज आप लोगों के लिए कुछ ऐसी बातें लायी हूं जो हमें प्रकृति से जोड़ेगी और हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।।
आशा करती हूं कि हमारे आज के विचार आपकी पसंद आये।🙏
"प्रकृति", आज की नई पीढ़ी शायद कही न कही इस शब्द की ताकत से वंचित है,  आजकल  की भागदौड़  भरी जिंदगी मेंं लोग प्रकृति के  साथ सामंजस्य ही  नहीं बैठा पाते, और फिर थक जाने के बाद वो इसी सुकून की तलाश में कभी  कभी लांग वेकेशन पर जाते है।।

जब वो चीज़ हमारे आसपास ही उपलब्ध है तो उसे ढूंढने हम बाहर क्यों जाए, या उसके लिए पैसे क्यों खर्च करे।।
 
खैर ये सब छोड़िये, असली मुद्दे पर आते है।। आप लोग सोच रहे होंगे कि प्रकृति का सानिध्य ही क्यों, हवा लेने के लिए हम A. C. कूलर में बैठ जाते है।।  ठंड से बचने के लिए रूम हीटर भी है।। फिर बाहर क्यों जाए।।

लेकिन शायद आप ये भूल रहे है कि इन कूलर और रूम हीटर से हमारे सेहत पर कितना नुकसान पहुँचता है।।
मैंने कई लोगों को देखा है जिनका रंग A. C. में रहने से एकदम सफेद हो जाता है, रूम हीटर से हमारे बॉडी का खून सूख जाता है।।।

ऐसा क्यों पहले के लोग तो कभी बीमार नहीं पड़ते थे।। 
गाँव के लोगों का ही उदाहरण लेते है, उनके बच्चे ठंडी में भी नङ्गे घूमते है फिर भी बीमार नहीं पड़ते क्यों,
क्योंकि उन्हें प्रकृति की आदत पड़ चुकी है।।

हम जिस वातावरण में रहते है, हम उसके habitual हो जाते है।।
आज हम मन की शांति के लिए meditation करते है yoga करते है, ये क्या है ये यही तो है जो हमें प्रकृति से जोड़े रखता है।। पहले आयुर्वेद था जिसके इलाज से बड़ी से बड़ी बीमारी भी ठीक हो जाती थी, अब जरा सा भी हमें तकलीफ होती है तो हम एक टैबलेट (medicine) निकालते है और फाँक लेते है।। क्या है ये, ये हमारे शरीर की बीमारी को ठीक नहीं करता ये सिर्फ उसे दबा देता है।। और आयुर्वेद हमें अंदरूनी ताकत देता है ताकि हम किसी भी प्रकार की बीमारियों को हरा सके।।

आज आप लोगों को एक किस्सा सुनाती हूँ हमारे जीवन से ही सम्बंधित,

"कुछ साल पहले की बात है जब मेरे घर पर इन्वर्टर नहीं था, न फ्रिज थी, उस वक़्त न ही हमारे घर मोबाइल था, न उस वक़्त हमारे गाँव की बिजली इतनी अच्छी थी, हमारे यहाँ लाइट का रोस्टर हुआ करता था, मतलब की हफ्ते के 7 दिन बिजली दिन में आएगी, अगले हफ्ते के सात दिन बिजली रात में आएगी।।"

तब ना हमारे यहाँ पानी की सुविधा के लिए सबमर्सिबल था, तब सिर्फ सरकारी नल आया करता था, दो समय, एक सुबह, दूसरा शाम,
अगर पता चले तो भर लो, किसी दिन भूल गए तो अगले वक़्त का इंतजार, उस वक़्त  फिर भी हम बहुत खुश से आज से शायद कही ज्यादा,
जानते है क्यों???

"क्योंकि तब हमारे परिवार में प्रेम था, रात में सब साथ में छत पर जाते, फिर घण्टों बातें होती, और वही सब सो जाते।। सुबह नल की सीटी के साथ नींद खुलती, घर में आँगन भी था तब, जहाँ पानी की एक तरफ पाइप फैली होती, तो दूसरी तरफ मम्मी कपड़े धुलती, तो एक तरफ हम उसी पाइप के साथ पानी में खेलते बदमाशियां करते।।  हाँ थोड़ा बचपन था, पर सच बहुत सुकून था,  जब किसी से बात करनी होती तो हम टेलीफोन बूथ पर जाया करते थे रात में पापा के साथ मैं और मेरा भाई,  तब न रोज फ़ोन पर बातें नहीं होती थी, और जब कभी होती तो बेशुमार होती थी, सिक्के डालते रहो घड़ी देखते रहो बात करते रहो।। ज्यादा नहीं फिर भी 20 रुपये तक तो हो ही जाती थी बात।। कभी नए साल पर किसी को बधाई देने के लिए, या कभी कोई खबर देने के लिए।।
और पड़ोस का भी नंबर दे रखा था रिश्तेदारों को, जिससे कभी उनको कोई खबर देनी हो तो वो उनको बता दे।।
तब न हम हाथ के पंखे इस्तेमाल करते थे, जिसे "बिनवा" कहते है।। पन्नी या दफ़्ती से बिने हुए।।

तब न हमारे यहां पीली रौशनी होती थी लालटेन की, या फिर कोई दवाई की खाली शीशी में मिट्टी का तेल भर कर उसमें बाती जलाते थे।।

उस पीली रौशनी में उस वक़्त हमारे बहुत ख्वाब बुने थे।। हमारी पढ़ाई तब ही हुई।।

इंटर मीडिएट में थी जब इन्वर्टर आया हमारे घर।।

तब न शाम के समय सब लोग अपनी अपनी छतों पर हुआ करते थे।। बहुत अच्छा लगता था, 
अब तो ना जैसे हर तरफ कैद खाना नजर आता है, सब अपने अपने में व्यस्त, लाइट है इन्वर्टर है तो रौशनी का काम ही नहीं,  कूलर है तो विंडो भी ओपन नहीं करनी।।  
अब तो ऐसा लगता है कि एक पिंजरे के कैदी बन गए है हम सब।। या कोई जीती जागती मशीन,
जिसे सिर्फ पैसा कमाना है बहुत सारा।।

पहले न जब सरकारी नल कभी खराब हो जाता था, तो हम अपने अपने घर की डिब्बे बाल्टी लेकर पास के हैंडपंप में जाया करते वहां पर भी लड़ाई होती थी, कि पहले हम भरेंगे पहले हम भरेंगे पर उस लड़ाई में भी न अपनापन झलकता था, अब तो कोई बात ही नहीं होती लड़ाई तो बहुत दूर,।।

तब हम हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ते थे,  जहाँ पर टाट होती थी बैठने के लिए, जिसके लिए हम लोग जल्दी कोशिश करते स्कूल जाने की कही पैदल या फिर साइकिल से ताकि हम पहले जाकर आगे बैठे।।
पर अब तो स्कूटी या कार से नीचे तो बच्चे पैर ही नहीं रखते।।
तब हम रात में छतों पे लेटे जब तक नींद न आये तब तक तारे गिना करते थे।। अब तो ये सब देखने की फुर्सत ही नहीं किसी के पास।।

खैर मेरी छोड़िए,

"अब ना लोग इसीलिए डेट पर जाते है लांग ड्राइव पर जाते है, सन बाथ लेते है, ताकि प्रकृति से जुड़े रहे।।

कितनी अजीब बात है ना, अलग से ये सब हम करते है अब, जबकि हम चाहे तो टाइम मैनेज करके ये सब अपने वर्क के साथ जोड़ सकते है।।

जैसे कि संडे के दिन जब हम घर पर रहते है तो पूरा दिन कोशिश करे तो छत पर बिता सकते है।। मॉर्निंग की योग एंड मेडिटेशन तो होगी ही वहाँ, फिर कार्नर में शेड के नीचे बैठ कर हम आफिस का काम कर सकते है।। घर की औरतें जैसे सब्जी काटने का काम या कुछ हाथ की सिलाई बिनाई का काम भी छत पर बैठ कर किया जा सकता है।।
 डेट नाईट पर या डिनर पर बाहर जाने से बेहतर की छत पर ही तारों के नीचे चटाई बिछाकर होटल से खाना ऑडर करके भी हम कभी कभी वहा खा सकते है।।

कभी कभी हम छत पर अपनी वाइफ के साथ रोमांटिक नाईट भी बिता सकते है।।
या फिर वीकेंड में फैमिली के साथ मिलकर छत पर ही खाना पका सकते है व रात में खा सकते है।।

जैसा कि मूवी में दिखाता है हम फैमिली के साथ अपने गार्डन पर पिकनिक भी मना सकते है व मोबाइल की दुनिया से बाहर निकल कर कुछ वक्त आउटडोर गेम्स के साथ अपना समय बिता सकते है।।

हम इस तरह कई तरीके खोज सकते है।। जो हमें प्रकृति से जोड़े रखे औऱ हमारे काम का नुकसान भी न हो। न ही हमारा समय व्यर्थ जाए।।
 

उम्मीद है कि आप सब इसे पढ़कर बोर नहीं हुए हो।।
आप एकबार प्रकृति से अपने सम्बन्ध जरूर बना कर देखिए।। आपको आंतरिक शांति व सुकून प्राप्त होगा व देखिएगा आपके बॉडी में एक नई ताकत फुर्ती आ जाएगी।।

धन्यवाद🙏

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