मानवता
मानवता
कोरोना से पीड़ित इस माहौल में जहां सब अपने–अपने में परेशान थे, वही एक 7 साल की नन्हीं गुड़िया दूसरों के लिए व्याकुल थी।।
गुड़िया इन सब से बेखबर बस अपने घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठे उस बेघर परिवार की चिंता में डूबी थी।
उसे नहीं थी कोई फिक्र की वो भी बीमार हो सकती है, उसे भी वायरस पकड़ सकता है।।
उसे बस फिक्र थी तो उन परिवार में पल रहे दो मासूमों की, जो घर की देहरी पर बैठ भूख से तड़प रहे थे।।
गुड़िया की माँ चिल्लाते हुए बोली,"अंदर आती है या नहीं, वरना तेरे बाप से कह कर टाला डलवा दूँ द्वार पर।। जब देखो उन नंगे गन्दे बच्चों के पास जाती है ।कल को तू बीमार हो गई तो क्या करेंगे हम।।"
गुड़िया जो उम्र की कच्ची थी पर जीवन के अनुभव से गठी,
माँ से इतराते हुए बोली,
"मैं बीमार होउंगी अगर तो तुम और बाबा हो न मेरे लिए,
पर कल को इन बेघरों को कुछ हो गया तो ये बेचारे बेमौत मारे जाएंगे, इनके पास तो न रहने का घर है, न खाने को दो जून की रोटी, न बीमारी की दवा दारू के पैसे,"
अगर ये हमारे घर के बाहर बैठे है, इसका मतलब तो यही है न कि इनको हमसे उम्मीदें है, वरना चबूतरे तो सबके घर के द्वार पर है ये वहाँ न चले जाते।।"
माँ जो अब तक गुस्से में थी, आँखों में आँसू भरकर बोली, "लाडो तू आज बड़ी हो गई और हम बड़े होकर भी तेरे सामने मानवता से छोटे पड़ गए, हमें माफ करना मेरी लाडो।"
फिर माँ ने कुछ पुराने कपड़े निकाले, और कुछ खाने का सामान लेकर लाडो के साथ बाहर तरफ बने कमरे में रखे और उस बेघर परिवार को उस कमरे में ले गए और उन्हें कपड़े व खाना दिया।। वो परिवार उनका ऋणी हो गया, और बार बार दोनों हाथों से गुड़िया और माँ को भरपूर आशीष दिया।।
सीख– उस नन्ही सी बच्ची ने आज मानवता का असल पाठ सिखाया व बताया।। वो छोटा सा कमरा आज किसी का घर बन गया।।
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